सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुली।
पिछले दिनों घर और मन के शोर के कारण इनकी आवाज़ सुनाई ही नहीं दे रही थी।
आज घर में सन्नाटा पसरा हुआ है और मन भी शांत है।
तभी ख्याल आया मेरे आँगन की चिड़िया उड़ गयी और उदासी के बादल का टुकड़ा आ गया।
बेटी की विदाई के बाद घर के अंदर तो वीरानी छा ही जाती है बाहर से भी बेरौनक दिखने लगता है घर।
प्रशांत ने घर में घुसते ही कहा।
आ गए टहल कर।
बैठिए मैं नींबू पानी लाती हूँ
खुद को संयत करते हुए मैंने कहा और अपने आँसू छिपाते हुए रसोईघर की तरफ चल पड़ी।
पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद घर की सफाई अभियान में जुट गयी।4 दिन पहले ही बिटिया की शादी के लिए घर मेहमानों से भरा हुआ था।सबके जाने के बाद सब कुछ अस्त-व्यस्त हुआ पड़ा था। इसी क्रम में बेटी के कमरे में गयी।यहाँ आते ही यादों की किताब के पन्ने खुलने लगे ।कमरे की हर चीज से यादें जुडी हुई थीं । चलचित्र की तरह मानस पटल पर अंकित सभी घटनाएँ सजीव होने लगीं।घुटने के बल चलती हुई छोटी सी नियति,डगमगाते कदमों से चलने की कोशिश करती हुई,छोटी छोटी चुटिया बना कर गले में वाटर बोटल और कंधे पर बैग टांगे स्कूल जाती हुई,स्पोर्ट्स डे में दौड़ती हुई,मेडल पहनती हुई,कॉलेज के कॉन्वोकेशन में सर्टिफिकेट लेती हुई नियति।साइकिल चलाना सीखने में डरने वाली कब धड़ल्ले से स्कूटी चलाने लगी पता ही नहीं चला।एक एक पल मानो पलक झपकते ही बीत गए
दिन महीने में और महीने साल में बदलते जाते हैं,वक्त रेत की तरह हाथ से सरकता चला जाता है।
ऐसा लगता है जैसे कल ही की तो बात है जब मैं नियति को घर ले कर आई थी।
शादी के 10 वर्ष बाद मेरी गोद खाली थी।विवाह के 2 वर्ष बाद ही चिंता व्यापने लगी थी ,उसके बाद सैकड़ों तरह के ईलाज, दवा,डॉक्टरों और जानकारों से सलाह-मशविरा,जिसने जो कहा,जहाँ भी जाने की सलाह दी ,सब कुछ किया.......पर कोई नतीजा नहीं निकला।
जीवन बगिया हरी-भरी थी बस फूल नहीं खिल रहे थे।
ऐसे में दोस्तों और रिश्तेदारों पहले तो दबे ढँके बाद में खुल कर यह कहना कि क्या करना धन जोड़ कर जब उसको कोई भोगनेवाला वारिस ही न हो ।
कभी कभी सास भी वारिस न होने का रोना रोती और अपने बेटे की दूसरी शादी की धमकी भी दे दिया करती थी। मैं अंदर ही अंदर टूटती जा रही थी।प्रशांत मेरे साथ थे सांत्वना देते रहते थे ।जीवन नैया ऐसे ही बिना पतवार बिना मंज़िल के चली जा रही थी
संतानहीन होना औरत के लिए अभिशाप से कम नहीं होता है।समाज में मुँह चुराती हुई औरत जिस मानसिक यंत्रणा से गुजरती है उसके दर्द और वेदना को कोई महसूस नहीं कर सकता है।
एक दिन अख़बार में झाड़ी में फेंकी हुई नवजात बच्ची की ख़बर पढ़ी ।ईश्वर का ये कैसा न्याय है कोई एक बच्चे के लिए तरस रहा है और कोई कूड़ा-कर्कट की तरह फेंक रहा है ।और मैंने बच्चा गोद लेने का निश्चय किया ।
रात को जब प्रशांत आए तब उनके सामने मैंने यह प्रस्ताव रखा ।
अरे यार मेरे दिमाग में पहले यह बात क्यों नहीं आई।
उनकी इस प्रतिक्रिया से मैं हैरान भी हुई और खुश भी ।
अब समस्या थी ,माँ जी और पापा जी को मनाने की ।
गोद लेने की बात सुनते ही वो लोग भड़क उठे।
जिसकी न जात-बिरादरी का पता ,न खानदान का पता ,उसको अपने घर में रखोगे।
दिमाग ख़राब हो गया है तुमलोगों का और भी बहुत कुछ बोलने के बाद थोडा गुस्सा शांत हुआ तब प्रशांत के बहुत समझाने पर आखिरकार मान ही गए।
माँ जी -पापा जी की इच्छा बेटा की थी पर मेरी बेटी की क्योकि बेटियो के बिना घर सुना लगता है और एक दूसरा कारण था अनाथालय में पलने वाली लड़कियों का जीवन बहुत कठिन होता है,इसलिए कम से कम एक लड़की के जीवन में ख़ुशी ला दूँ तो अपने जीवन को सार्थक समझूँ।
हमदोनों को ही बेटी की चाह थी इसलिए
एडॉप्शन एजेंसी से सारी कार्यवाही करके एक बेटी ले आए जिसका नाम नियति रखा।
नियति ने मेरे जीवन को तपती धरती पर वर्षा की पहली फुहार के बाद उठने वाले सौंधी महक की तरह महका दिया था।
शुरुआत में माँ जी और पापा जी को नियति को अपनाने में दिक्कत हुई पर बच्चे की निश्छल मोहिनी मुस्कान से कोई कब तक नज़रे चुरा सकता है।कुछ ही महीनों में सबकी लाडली बन गयी ।
मेरी गृहस्थी भी आप पूर्ण हो गयी लगने लगी थी।
जब नियति 5 वर्ष की थी तब स्कूल से रक्षा बंधन के त्योहार के बारे में जान कर आई और भाई की जिद पकड़ कर बैठ गयी।
एक ऐसी मुसीबत जिसका कोई समाधान ही नहीं। उसको अपने भाई को राखी बांधनी थी पर भाई कहाँ से लाएँ।
राजहठ,स्त्रीहठ और बाल हठ से पार पाना आसान नहीं होता है।
ऐसे में माँ जी का सूझबूझ काम आया ।बड़ी मुश्किल से समझा बुझा कर अपने लड्डू गोपाल की मूर्ति को नियति का भाई बना दिया और राखी बंधवाई।
ऐसे समय में लगता है घर में बुजुर्गों का होना कितना आवश्यक होता है।उनके अनुभव परेशानियों से कितनी आसानी से बाहर निकल लेते हैं।
इसे सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना का फल कहें या चमत्कार ,अगले रक्षा बंधन के एक महीने पहले लड्डू गोपाल खुद बाल गोपाल बन कर मेरी गोद में आ विराजे अपनी बहन से राखी बँधवाने
मेरा घर खुशियों से चहक उठा।सब बहुत खुश थे।नियति पहले सिर्फ लाड़ली थी दादा-दादी की अब तो सौभाग्यशालिनी भी हो गयी उनकी नजर में।
जिंदगी में खुशियों की बरसात हो रही थी तभी वज्रपात हुआ ।देव,मेरा बेटा बीमार हो गया। बचपन से ही वो कमजोर था बार बार बीमार हो जाता था पर इस बार उसका बुखार उतर ही नहीं रहा था । महीने भर जब बुखार रह गया तब डॉक्टर ने बहुत सारे टेस्ट कराए।टेस्ट रिपोर्ट देख कर हम सबके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई ।उसकी किडनी ख़राब हो गयी थी ।डॉक्टर ने ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी । समस्या आई किडनी डोनर की,मैं और प्रशांत डायबिटीज,उच्च रक्तचाप और थायरॉयड से पीड़ित,इसलिए किडनी नहीं दे सकते थे। देवर किडनी देने के लिए तैयार थे पर देवरानी के दबाव में बाद में उन्होंने ने भी इंकार कर दिया। हम बेबस और लाचार थे बेटे की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी ,कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें तभी नियति ने किडनी देने का फ़ैसला हमको सुनाया। मैंने और प्रशांत ने सुनते ही इंकार कर दिया, वो लड़की थी और उसकी सगाई भी हो चुकी थी ऐसे में उसका किडनी देने का निर्णय हमलोगों को उचित नहीं लगा।
माँ अगर मैं मेरे भाई के काम नहीं आऊँगी तो और कौन आएगा,प्लीज आप मत रोकिए।मैंने डॉक्टर से भी बात कर ली है और सारे टेस्ट भी करवा लिए हैं।उन्होंने कहा है कि मैं किडनी दे सकती हूँ। नियति ने मुझे समझाते हुए कहा।
बेटा तुम्हारे पापा डोनर ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं न ,मुझे भी भरोसा है कि जल्दी ही कोई मिल जाएगा। मैंने कहा
क्या जरुरत है डोनर ढूंढने की जब मैं दे सकती हूँ तब- नाराजगी से नियति ने बोला।
तुम समझ नहीं रही हो,तुम्हारी सगाई हो चुकी है तुम्हारे ससुराल वाले इसके लिए कभी नहीं मानेंगे और उनसे छुपा कर भी इस काम को नहीं किया जाएगा। तुम्हारी जिंदगी बरबाद हो जायेगी।
बेटे की तकलीफ क्या कम है जो बेटी का भी दुःख जीवन भर के लिए पाल लूँ- कहते कहते मेरी आँखें नम हो गयीं।
ओफ्फो माँ ! आप शालु आंटी और अभय अंकल को जानती तो हैं फिर भी ऐसा सोच रही हैं ? आपको क्या लगता है,मैंने उनलोगों को इस बारे में नहीं बताया है ? इंफैक्ट श्रेयस और अंकल- आंटी से बात करने के बाद ही मैं डॉक्टर से मिलने गयी थी।यकीन करें आप उनलोगों को कोई एतराज नहीं है। ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह वो मुझे ये सब बता रही थी और मैं उसको देखे जा रही थी,ऐसा लग रहा था जैसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। आशातीत था सब कुछ पर नियति अपनी आशा के अनुरूप नहीं होती है यह भी सच है।
शालु मेरी सहेली है उसके परिवार के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है।नियति और श्रेयस की शादी की पहल भी उसने ही की थी और अब ये सब।यही सोच कर आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक गए।दोहरी ख़ुशी थी बेटे को जीवनदान मिलने की आस जगी और बेटी को इतना अच्छा ससुराल मिल रहा है।
अपने जब साथ छोड़ते हैं पराए संभाल लेते हैं।देवर ने इंकार कर दिया दोस्त और परायी जाइ ने भँवर से निकाल लिया।
ऑपरेशन के बाद देव जब हॉस्पिटल से घर लौटा तब उसने नियति से बोला- दीदी तुम मुझे राखी बाँधती थी अपनी रक्षा करवाने के लिए पर उल्टा हो गया तुमने मेरी रक्षा की।
ऐसा नहीं है बुध्धू रक्षा का दायित्व सिर्फ एक पर नहीं होता है दोनों एक दूसरे की रक्षा करते हैं खासकर तब जब भाई छोटा हो। है न पापा नियति ने प्रशांत की तरफ हमेशा की तरह सहमति के लिए देखा जो उसकी हर बात पर सहमत ही रहते थे ।
दीदी आप यहाँ हैं और मैंने पुरे घर में आपको ढूंढ लिया। वृन्दा मेरी मेड ढूंढते हुए आई थी।उसकी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी। देखा तो बारह बज गए थे ।
कमरा उसी तरह अस्त-व्यस्त पड़ा था।पुरानी यादों में ऐसे गम हुई कि किसी बात का होश ही नहीं रहा।मन भी बड़ा विचित्र है पल भर में ही कहाँ से कहाँ पहुँचा देता है।
क्या हुआ दीदी बिटिया की याद आ रही है क्या ? वृन्दा ने पूछा।
हां रे उसके बिना घर भी सूना-सूना लग रहा है और मन भी ।कहने को तो सिर्फ एक कमरा खाली हुआ है पर देखो तो पूरा घर वीरान दिख रहा है। मैं अपने मन की बात वृन्दा से कर रही थी।
क्या करें ये तो जग की रीत है बेटियों को जाना ही पड़ता है।उसने भी ऐसे मौके पर दिए जाने वाले ज्ञान को दे दिया।
मैं फिर से सोचने लगी बेटियों का शादी के बाद माँ-बाप के घर से जाना तो नियम है पर जन्म लेते ही कूड़े के ढेर में,नलियों में जाना भी नियम है क्या
नियति के जन्मदाता माता-पिता ने भी उसकी विदाई की रही होगी उस समय उनकी मनोदशा न जाने कैसी रही होगी पर उसकी शादी के बाद वाली विदाई से जो संतुष्टि और बिछड़ने के दुःख में भी जो सुख मुझे मिला है उनको मिला होगा यक़ीनन नहीं।हो सकता है मन में कहीं एक पश्चयताप का भाव होगा उनके और होना भी चाहिए क्योंकि उन्होंने एक हीरे को पत्थर समझ कर फेंक दिया था जो मैंने पा लिया।
Wednesday, April 27, 2016
नियति
Saturday, April 16, 2016
रिश्ते: अपने पराए
दोपहर को ऑफिस में था तभी एक फोन आया जिसने मुझे बेचैन कर दिया । सारे काम छोड़कर सेक्रेटरी से कह कर टिकट्स बुक करवाया ।
घर फोन करके अरुणा को बताया निभा बुआ की तबियत ख़राब है जल्दी पैकिंग करके एयरपोर्ट पहुँचने का कह कर ऑफिस से निकल गया।
मन में बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे किसी तरह उनको झटक कर खुद को संभाल रहा था। जब भी कोई मुश्किल समय आता है न जाने क्यों मन में नकारात्मक विचार ही आते हैं।
रास्ते भर अंतर्द्वन्द से लड़ते हुए घर पहुँचा ।
बुआ अंतिम साँसे गिन रही थीं।हमलोगों को देख कर उनके चेहरे पर ख़ुशी और संतोष के मिले-जुले भाव आए और एक हिचकी के साथ उन्होंने सँसार से विदा ले लिया। लोगों ने कहा उनके प्राण मेरे लिए ही अटके हुए थे।
इतनी जल्दी बुआ का साया हमारे सर से उठ जायेगा कल्पनातीत था मेरे लिए।
3 महीने बाद 60 की होने वाली थीं उस अवसर को यादगार बनाने की प्लानिंग कर रहे थे हमलोग ।अरुणा ने तैयारी भी शुरू कर दी थी लेकिन ऊपर वाले को यह मंजूर नहीं था।
उनके मरने की खबर जंगल के आग की तरह फ़ैल गयी,लोग जमा होने लगे भीड़ बढ़ती जा रही थी। शवयात्रा में लगता था पूरा शहर उमड़ आया है।पुरे इलाके में मातम सा छा गया।
वर्षों घर और शहर से दूर रहने के कारण मुझे पता ही नहीं था बुआ कितनी लोकप्रिय थीं।
वो एक ऐसी औरत थीं जो अपना कहे जाने वालों से तो दूर थीं पर पराए कहे जाने वालों की सगी थीं। जब अपनों ने नाता तोड़ लिया तो उन्होंने परायों से रिश्ता जोड़ लिया।
उनकी तेरहवीं तक मुझे यहीं रुकना था,इसलिए बच्चों को भी बुलवा लिया।।अब यहाँ का सारा भार मुझ पर ही था। मेरा शहर है यह फिर भी मेरे लिए अनजान है।पढाई और कैरियर में अपने शहर से कितना दूर चले जाते हैं हमलोग।
चाय पी लो की आवाज़ ने विचारों के भँवर से बाहर निकाला ।
अरुणा चाय ले कर आई थी।
किस सोच में डूबे हुए हो ? उसने पूछा।
बुआ के बारे में सोच रहा हूँ, मैंने चाय का कप उठाते हुए कहा।
सब कुछ इतना अप्रत्याशित हुआ कि मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ।
परेशान मत हो,जिंदगी में ऐसे क्षण आते ही हैं ।सबकुछ अपनी योजना के अनुसार कहाँ होता है। कह कर चली गई और मैं फिर से यादों के भँवर में गोते लगाने लगा।
बुआ एक योग्य डॉक्टर थीं, दूर दूर से लोग उनके पास इलाज़ के लिए आते थे।योग्यता को मधुर व्यवहार का साथ मिला और जादू हो जाता था। नर्सिंग होम में आने वाले लगभग सारे मरीज से उनके पारिवारिक रिश्ते बन जाते थे। नर्सिंग होम का सपना मेरे पापा ने देखा था,अपने छोटे से शहर बड़े हॉस्पिटल जैसी सुविधाओं वाला । दोनों ने मिल कर इसकी शुरुआत की थी बाद में बुआ ने उसमें रंग भरें ,पंख दिए और ऐसी ऊँची उड़ान भरी जिसे कोई और छू भी नहीं सका।
एक धन सम्पन्न परिवार की तीसरी संतान थीं बुआ,दो भाइयों की इकलौती बहन।बचपन लाड-प्यार में बीता लेकिन माँ का साया भी बचपन में ही छिन गया, चुलबुली ,हँसमुख और नटखट होने के कारण वो सबके आकर्षण का केंद्र रहती थी,अपनी बात किसी से भी मनवा लेने की कला जन्मजात थी।इन्ही गुणों के कारण स्कूल कॉलेज में भी लोकप्रिय थी और ताउम्र रहीं।
मेरे पापा से उनकी पहली मुलाकात कॉलेज के वाद-विवाद प्रतियोगिता में हुई थी,जहाँ इस अटूट रिश्ते का जन्म हुआ ।पापा की कोई सहोदर बहन नहीं थी बुआ ने इस कमी को पूरा किया।कभी कभी मन के रिश्ते खून के रिश्तों से ज्यादा मजबूत साबित हो जाते है अगर उसका आधार प्रेम हो न कि स्वार्थ।
दादाजी और दादी ने भी बुआ को अपनी बेटी मान लिया अब उनके दो घर थे।अपने घर से ज्यादा समय मेरे घर में बीतता था क्योंकि अपने घर में भाइयों की टोका टाकी और धौंस सहनी पड़ती थी उसके विपरीत मेरे घर में उनकी ज़िद और मनमानी को भी सर आँखों पर रखा जाता था।
पापा की शादी में भी बुआ की पूरी दखलंदाजी थी ,लड़की पसंद करने से रिसेप्शन तक की तैयारी उन्होंने ही की। जिंदगी सामान्य से चल रही थी तभी एक मोड़ आया और पिता का साया भी उनके सर से उठ गया ।यहीं से शुरू हुआ मानसिक यंत्रणा का दौर ।
पिता ने अपनी सम्पति तीनों संतान में बराबर बराबर बाँट कर वसीयत कर दी थी,भाई-भाभियों को यह बात नागवार गुजरी।
निभा डॉक्टर निभा थी पर थी तो लड़की ही उसको बराबरी का दर्जा क्यों
साम,दाम,दंड भेद जैसे भी हो वैसे सम्पति हथियाने की होड़ लग गयी दोनों भाइयों में।इससे क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपना हिस्सा भाइयों के नाम किया और हमारे घर आ गयी।
दादी दादाजी की बेटी तो वो थीं ही सहर्ष उनको अपना लिया गया।दादा जी ने उनकी शादी कर देनी चाही पर बुआ ने इंकार कर दिया और उनकी ज़िद के आगे सबको झुकना पड़ा
जिंदगी के नए सफ़र की शुरुआत करने चल पड़ी ,पापा और बुआ ने साथ मिल कर पहले क्लीनिक शुरू किया ।धीरे -धीरे प्रैक्टिस भी जमने लगा और लोकप्रियता बढ़ने लगी।
बहुत छोटी उम्र में दुनिया के बहुत रंग उन्होंने देख लिए।घर छूट,सगे पराए हो गए।अपनों से दुःख मिला तो उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धान्त आत्मसात् कर लिया फिर तो न जाने कितने लोगों की बहन,बुआ मौसी बेटी बन गयीं पता ही न चला,इनलोगों से उनका रक्त संबंध नहीं था पर उनकी एक पुकार पर आधी रात को भी आ जाते थे ।इनलोगों के साथ दिल का रिश्ता था ।
मैं दसवीं में था तब हॉस्पिटल के लिए जमीन देख कर लौटते समय एक दुर्घटना में मम्मी पापा की मौत हो गयी।
तब से बुआ ही मेरी सब कुछ थीं ।मेरी छोटी छोटी जरूरतों का भी उनको ख्याल रहता था ,मम्मी-पापा की कमी कभी महसूस ही नहीं होने दी। पढाई-लिखाई ,शादी सब उन्होंने ही किया।मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी पर मैंने इंकार कर दिया मुझे एलएलबी करना था ।मेरा एडमिशन बैंगलोर नेशनल स्कूल ऑफ़ लॉ में करवाया ।अकेले ही घर और हॉस्पिटल की देखभाल करती रही पर मेरी शादी डॉक्टर से करवा दी
मेरी जिंदगी के हर पल में उनकी यादें बसी हुई हैं,उनके बिना जिंदगी कैसी होगी कल्पना भी नहीं कर सकता ।बहुत दूर चली गयीं
बार-बार प्रश्न मन में उठ रहा है बुआ मेरी अपनी थी या उनके भाई उनके अपने थे जो उनके मरने पर भी शोक जताने भी नहीं आए
कैसे ये रिश्ते हैं जहाँ पराए अपने हो जाते हैं और अपने पराए
Friday, December 26, 2014
भय और प्रेम
इस संसार में जितने भी जीव हैं सबको भय की अनुभूति होती है। बच्चा हो या वृद्ध ,मनुष्य हो या पशु सबको भय का अनुभव होता है।
भय होने का कारण मन की कमजोरी,अज्ञानता,कायरता या लोकलाज को समझा जाता है परन्तु जब गहराई से इस पर विचार करेंगे तब पाएंगे कि भय का मूल कारण प्रेम का आभाव है।
वैसे तो एक कहावत प्रचलित है-"भय बिन प्रेम न होय"
पर वास्तविकता तो यही है की ऐसा प्रेम एक प्रकार की स्वार्थ की भावना है न की प्रेम ,भले ही वह स्वार्थ किसी भी प्रकार का हो,किसी भी कारन से हो।
स्वाभाविक प्रेम तो बिना शर्त होता है,कुछ पाने के लिए नहीं कुछ देने के लिए होता है। पाने के लिए किया गया प्रेम लोभ है,वासना है और व्यापार है।
वास्तविक प्रेम भयरहित होता है इसलिए जिससे प्रेम होता है उससे भय हो ही नहीं सकता है। भय के बल पर प्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता सिर्फ घृणा ही प्राप्त की जा सकती है।
जो जिससे भयभीत होता है वह उससे कभी प्रेम नहीं कर सकता और जिससे प्रेम करता है उससे कभी भयभीत नहीं हो सकता।
हम परमात्मा से प्रेम नहीं करते हैं इसलिए भयभीत रहते हैं। जो परमात्मा से प्रेम करता है वही अभय हो सकता है और उसे फिर कभी भी,कहीं भी तथा किसी भी स्थिति में भय नहीं लगता क्योंकि परमात्मा सर्वकालिक है सर्व व्यापक है यानि हर समय हर जगह मौजूद रहता है।
Wednesday, June 11, 2014
नीच व्यक्ति के लक्षण
नीच व्यक्ति का प्रमुख लक्षण यही है कि वह बिगाड़ना तो जानता है पर बनाना नहीं जानता जैसे वायु वृक्ष को उखाड़ कर पटक तो सकती है पर गिरे हुए वृक्ष को उठा कर जमा नहीं सकती ।
काम बिगाड़ना ही नीचता है और नीच व्यक्ति काम बिगाड़ तो सकता है पर काम बनाता नहीं है ।
चूहा अन्न की पिटारी गिरा तो सकता है पर उठा कर रख नहीं सकता है ।बिल्ली दूध पी नहीं पाती है तो लुढका ही देती है पर फैले हुए दूध को वापस बरतन में नहीं डाल सकती है ।
ऐसा ही स्वभाव दुष्ट व्यक्ति का होता है या कह लीजिये कि ऐसे स्वभाव वाला व्यक्ति नीच होता है।
Friday, September 20, 2013
Santosh
Acharya Chanakya ne kaha hai ki santosh rupi amrut se trupt aur shant chitt wale manushyo ko jis sukh shanti aur aanand ka anubhav hota hai wah dhan ke lobh me idhar udhar bhatakne walo ko nahi hota
Kai mamlo me manushay sirf isliye dukhi rahta hai qki wah santoshi swabhav ka nahi hota isliye use kitna bhi mil jaye wah aur jyada pane ke liye lalayit bana rahta hai aur daud dhup karta rahta hai lihaja dhan sampada to prapt kar leta hai par sukh shanti se vanchit rahta hai
Kam se kam teen bato me to manushya ko santosh karna hi chahiye 1)pati/patni 2) bhojan 3) dhan sampada in teeno ke mamle me santosh na rakhne wala mansik aur shareerik vyadhiyo se bhi peedit hota hai aur bhinn bhinn jhanjhato me bhi fansta rahta hai .is tarah , uske pas jo hai uska sukh bhi nahi le pata hai aur jo aprapt hai uske liye dukhi bana rahta hai.aise pida sur dukh se bachne ka ekmatra tarika hai santosh ko apnana.kaha gaya hai na JO AAYE SANTOSH DHAN, SAB DHAN DHOOL SAMAAN
Wednesday, September 18, 2013
Dukh
Jeevan me dukhi hona koi nahi chahta fir bhee log dukhee hote hai,har prani sukh chahta hai sukhee jeevan chahta hai par sukh milta nahi hai milta bhee hai to jaldee khatm ho jaataa hai.har vyakti kaa jeevan sukh aur dukh kee anoobhutiyo se bhara rahta hai.kabhi sukh ka anubhav hota hai to kabhi dukh ka.sukh ka anubhav karna sabko achha lagta hai par dukh se dukhi hona kisi ko bhi achha nahi lagta .kuchh log dukh ko bhulane k liye prabhu ki upasna karte hai to kuchh gam galat karne k liye maadak dravyo ka sevan karte hain.waise jaraa gahre me dekha jaye to dukh ka hona ya na hona is par nirbhar karta hai ki ham ise anubhav karte hai ya nahi karte hai.dukh ki matra bhee is baat par nirbhar kartee hai ki dukh ka anubhav ham kitanee maatraa me aur kitanee gahraai se karte hai.ek dukh ek vyakti k liye pahaad k samaan hota hai to dusre k liye maamulee hota hai.darasal dukh ka ghat jana sukh aur sukh kaa ghat jaanaa dukh maalum detaa hai par jeevan me dono kaa hee anubhav hotaa hai.jo gyanee hote hai wo sukh aur dukh ke prati sambhav rakhte hain.
Tuesday, September 17, 2013
Prem aur moh
Prem aur moh mote taur par ek jaise hi dikhai dete hai par jara gahrai me jaa kar soche to inme bahut fark hota hai.pati-patni se prem karne ka dawa karta hai,patni-pati se prem karne ka dawa karti hai par ye dono shayad hi jante ho ki vastav me wo prem hi kar rahe hain ya moh me pade hue hai.yadi we paraspar aanand aur samarpan ka anubhav karte hain to hi wo prem karne ka dawa kar sakte hai aur yadi dukh tanav aur kalah ka anubhav karte hai to wo prem nahi kar rahe balki ek dusre ke moh me pade hue hai
Darasal prem ek swachhand aur aanad ku sthiti ka naam hai jiska samband shareer se nahi seedha aatma se hota hai.prem me yadi aasakti bhav ho to wah moh ho jaata hai aur aasakti bhav na ho to bhakti ho jata hai
Prem to moh aur bhakti ke bich ki ek yatra hai,koi sthir sthiti nahi ek sankraman hai.prem niche girta hai to moh ban jata hai upar uthta hai to bhakti ban jata hai
Aaskti rahit prem parmatma ka prasad hota hai isliye prem ko parmatma kaha gaya hai
Prem me dubi hui patni isliye pati me parmeshwar ko dekh pati hai kyoki stri ka hruday ahankar rahit aur samarpan bhav se paripurn hota hai .
Prem se bhara hruday jisse bhi prem karega usi me use parmatma dikhai dene lagega.
Paramatmaa ka darshan karne ke liye bhakti se bhari aankhe chahiye aasakti se bhari aankhe nahi