Sunday, July 17, 2016

परवरिश

शालू और श्रेया के पिता सगे भाई हैं.
एक ही घर में दोनों का जन्म हुआ.साथ पले बढे. एक ही स्कूल में शिक्षा-दीक्षा मिली. बड़े हुए कॉलेज में भी एक ही विषय से उच्च शिक्षा ली फिर दोनों सरकारी नौकर बन गए. शादी हुई और गृहस्थी अलग हुई.
दोनों के घर में पुत्रों का जन्म हुआ और एक-एक कन्या के पिता भी बने.
यहाँ तक सब कुछ सामान्य है. ऐसा लगभग प्रत्येक घर में होता ही है.
कहानी शुरू होती है शालू और श्रेया के बचपन से.
शालू और श्रेया हमउम्र हैं. बस एक साल का अंतर है दोनों की उम्र में. इसलिए एक ही कालखंड में उनका बचपन,तरुणावस्था और यौवन बीता.
शालू की परवरिश परम्परागत सोच के साथ की गयी……होश सँभालने के पहले से ही उसको समझाना शुरू कर दिया गया,तुमको ससुराल जाना है,सास-ससुर और ससुराल वालों की सेवा करनी है.
यूँ समझ लीजिए कि अप्रत्यक्ष रूप से उसके मस्तिष्क में यह बिठा दिया गया. तुम्हारे जन्म लेने का उद्देश्य शादी के बाद शुरू होगा और उसकी तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है.
इन सबके बाद भी हर बेटी की तरह शालू भी अपने पिता की लाडली तो थी ही,भाइयों के आँख का तारा भी थी,जैसा प्रत्येक भारतीय परिवार में होता है.

इधर श्रेया की परवरिश एक संतान की तरह से हो रही थी उसके माता-पिता ने बेटी के रूप में जन्म लेने का विशेष उद्देश्य उसको नहीं बताया था. जैसे उसके भाइयों का पालन पोषण हो रहा था वैसा ही उसका भी हो रहा था नतीजा ससुराल जाने की कोई तैयारी उसको नहीं करनी पड़ रही थी.
खेल-कूद,पढाई और पढाई करके नौकरी करने को ही श्रेया अपने जीवन का उद्देश्य समझती थी.
लड़की होने के कारण लड़कियों के नैसर्गिक गुण तो थे ही अतः घरेलू काम,जैसे घर की साफ़-सफाई,साज-सज्जा खाना बनाने में भी दिलचस्पी थी और जब तब इन कामों को अपनी मर्ज़ी से करती रहती थी.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा.
शालू और श्रेया शादी योग्य हो गयीं . घर वालों ने अपनी समझ से योग्य वर का चुनाव करके शादी कर दी.
शालू को विदाई के साथ डोली में जाने और अर्थी में ही ससुराल से निकलने का महामंत्र भी मिला.
श्रेया को कहा गया कि तुम अब बहु की जिम्मेदारी निभाने जा रही हो और जब भी तुमको हमारी आवश्यकता होगी हम हमेशा तुम्हारे साथ खड़े रहेंगे.

शालू की माँ अक्सर अपनी देवरानी को ताना दिया करती थीं,बेटी को सही शिक्षा नहीं देने का. उनका कहना था कि कितना भी पढ़ लिख जाए बेटी…….ससुराल जाने के बाद तो खाना बनाना और घर के काम करने की कला ही काम आनी है.
बेटी को बेटे की तरह नहीं पाला जाना चाहिए.
श्रेया की माँ उनकी बात से चिंतित हो जाती थी पर उसके पिता समझा बुझा कर उनको सामान्य कर लेते थे.
उनको अपनी परवरिश और बेटी की योग्यता पर भरोसा था कोई अनावश्यक दबाव नहीं पड़ने दिया श्रेया पर.

शादी के बाद दोनों को जीवन की नई चुनौतियों से सामना करना पड़ा.
शालू तो ससुराल की पूरी तैयारी से गयी थी पर श्रेया ने शादी से पहले तक पढाई और कैरियर से इतर कुछ सोचा ही नहीं था.

शालू के लिए घर की साफ़-सफाई,खाना बनाना,सिलाई-कढ़ाई और घर वालों की सेवा करना ही महत्वपूर्ण था. इससे ज्यादा उसने कभी नहीं सोचा. शादी हो गयी ऐसे परिवार में जहाँ बौद्धिक क्षमता को महत्त्व दिया जाता था.पति और ससुर व्यख्याता थे सास भी विदुषी थी. उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते थे.
इस माहौल में शालू असहज हो जाती थी जब पूरा परिवार किसी विषय पर चर्चा कर रहा होता था तब वो मूक दर्शक बनी बैठी होती या किचन में व्यस्त हो जाती.
उसके इस व्यवहार से पति के साथ सामंजस्य बिठाने में मुश्किलें आने लगी.
शालू अपने प्रत्येक काम के लिए किसी न किसी पर निर्भर रहती थी.
घर से बाहर के काम करने के लिए अकेले जाने के नाम पर उसके हाथ-पैर फूलने लगते थे…..ऐसा नहीं था कि वो कर नहीं सकती थी पर पिता और भाइयों पर निर्भर रहने के कारण उसके अंदर आत्म विश्वास की कमी थी.

श्रेया की शादी ऐसे परिवार में हुई जहाँ दो बहुएँ पहले से थी. दोनों गृहणी थीं और ये नौकरीपेशा. इसके सामने चुनौती थी दोनों के मान-सम्मान को ठेस पहुचाए बिना खुद को साबित करने की.

घर के काम की विशेषज्ञ तो थी नहीं पर उसने अपने आपको नए माहौल के अनुरूप ढालने के लिए अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए जिठानियों से आग्रह किया कि घर के काम-काज सिखने में उसकी मदद करें.
लगन के साथ किए गए ईमानदार प्रयास के फलस्वरूप जल्दी ही उसने ससुराल के माहौल में अपने आपको स्थापित कर लिया.

फिर भी उसकी उच्च शिक्षा और नौकरी कई उपयोगिता पर गाहे-बगाहे सास प्रश्न चिन्ह लगा ही देती थीं.
आई टी सेक्टर की मंदी के दौर में उसके सॉफ्टवेयर इंजीनयर पति की नौकरी चली गयी तब छह महीनों तक उसने ही घर संभाला.
घर और बाहर के बहुत से काम वो संभाल लेती थी.
घर के पुरुष भी उसके भरोसे बहुत से काम छोड़ देते थे
जिनको वो बखूबी निभाती थी क्योंकि मायके में भी ऐसे काम किया करती थी। उसके मायके में उसके और भाइयों के काम में बँटवारा नहीं किया गया था ।

अब सास ने भी ताना देना छोड़ दिया और अपनी पोतियों को भी उच्च शिक्षा दिलाने की हिमायत करने लगीं

शालू परेशान थी क्योंकि समझ नहीं पा रही थी कि पति और सास-ससुर से बढ़ती दूरी को कैसे कम करे।
उसकी समझ के अनुसार वो सबकुछ कर रही थी जो एक आदर्श बहु को करना चाहिए फिर भी कोई खुश नहीं था।
समझ नहीं पा रही थी कि आखिर चूक कहाँ हो रही है।
अपने आपको असहाय महसूस करती थी । भाभियाँ कहीं ताना न देने लगे इसलिए मायके वालों से भी अपनी परेशानी नहीं बताना चाहती थी।
इस वजह से अवसाद में रहने लगी।

दोनों की कहानी जानने के बाद प्रश्न उठता है कि बेटी का पालन-पोषण करने का सही तरीका कौन सा था ?
शालू के माता-पिता ने लड़की को लड़की की तरह की पाला।
श्रेया के माता-पिता ने उसको एक उनमुक्त वातावरण दिया लड़के लड़की में भेद किये बिना पाला।
शालू के माता-पिता का या श्रेया के माता-पिता का ??

Thursday, June 16, 2016

अधूरी माँ

एक औरत अक्सर मुझे पार्क में मिलती थी । हमेशा अकेली ही रहती थी। चालीस साल के आसपास उम्र होगी ,गोरा रंग गंभीर मुद्रा हाथ में मोबाइल और गाड़ी की चाभी लिए बच्चों के झूले के सामने वाले बेंच पर बैठी रहती थी।
शाम में मैं भी बच्चों को ले कर जाती थी। बच्चों के साथ खेल कर थक जाती तो वहीँ बेंच पर बैठ जाती थी ।
जिज्ञासावश एक दिन उससे पूछ बैठी आप अकेली ही आती हैं आपके बच्चे नहीं आते हैं यहाँ ?
मेरे बच्चे दूर रहते हैं इसलिए मैं अकेली ही आती हूँ।
कितने बच्चे हैं आपके ?
पाँच हैं चार लड़का और एक लड़की।
सुनकर मुझे झटका लगा।आज के समय में पाँच बच्चे सोच कर ही घबराहट सी होने लगी।
सबको हॉस्टल में डाल दिया है क्या आपने,कितने बड़े हैं सब ? मैं पूछ बैठी।
सबसे बड़ा लड़का ग्रैजुएशन कर रहा है दूसरा ग्यारहवीं में है तीसरा नौवीं में उससे छोटी लड़की पाँचवी में और सबसे छोटा पहली कक्षा में है और सब अपनी- अपनी माँ के पास रहते हैं।
बताते बताते उनकी आँखें नम हो गई।
मैं समझ गयी कि ये एक अधूरी माँ है जो अपनी ममता का शहद बाँट कर एक बड़े परिवार का निर्माण कर रही है,जहाँ कोई नहीं है और सब हैं।

Tuesday, June 7, 2016

वक़्त

फ्रिज में दो रसगुल्ले रखे थे,तुमने खाए हैं ??
हाँ मम्मी !
ऐसे बिना पूछे मत खा लिया करो,मैंने भोग लगाने के लिए रखे थे।
मम्मी नाराज होते हुए बोलीं
सीने में टीस सी उठ गई।
मोहित सोचने लगा,ये मेरी वही माँ हैं जो पहले दिनभर कुछ खाओगे बेटा ,पूछते हुए नहीं थकती थीं।
आजकल तो हर दूसरी बात पर मम्मी नाराज हो जाती हैं ,दिन में दस बार खर्चे,महंगाई और बचत की बातें सुनाती हैं। पापा भी दिन में एक बार तो मेरी पढाई पर हुए खर्चे की याद दिला ही देते है।
वक़्त बदल गया तो रिश्तों के एहसास भी बदल गए।
कुछ ही महीनों पहले तक जब भी घर आता तब यहाँ की फिजा कुछ और ही रहती थी।
मम्मी दिन भर प्यार लुटाते हुए आगे पीछे घूमती रहती थीं। पापा दुनिया-जहाँ की बातें करते,घर से जुड़ी समस्याओं की चर्चा करते।
कुछ महीने पहले वो कम्पनी ही बंद हो गयी जिसमें मोहित काम कर रहा था। नई नौकरी की तलाश में हाथ-पाँव मार रहा था लेकिन नौकरी इतनी आसानी से मिलती कहाँ है।
कल शाम मोबाइल रिचार्ज कराने के लिए पापा से पैसे मांगें थे तब भी मम्मी ने नसीहत देते हुए कहा,फालतू पैसे मत उड़ाओ,आमदनी नहीं है फिर भी खर्चों पर कण्ट्रोल नहीं है।
पहले हजारों रुपए मम्मी को दे देता था तब कभी मम्मी ने ऐसी नसीहतें नहीं दी,बल्कि हर आने-जाने वाले के सामने मेरे खुले दिल से खर्च करने की आदत का बखान करती रहती थीं।
कंपनी की तरफ से रहना और खाना फ्री था इसलिए बस थोड़े से पैसे अपने खर्च के लिए रख कर पूरी सैलरी घर भेज देता था ।यह सोच कर कि जो भी कमा रहा हूँ उस पर घरवालों का ही हक़ है,मुझे जरूरत ही नहीं है इसलिए कभी अपने पास कुछ बचा कर नहीं रखा।
नौकरी और पैसे ख़त्म होते ही प्यार,अपनापन,मान-सम्मान सब ख़त्म हो गया है। घर में बोझ बन गया हूँ।
माता-पिता भी ऐसा बर्ताव कर सकते हैं,सोचा भी नहीं था। रिश्ते भी पैसों के मोहताज होते हैं।
बेटा सब सामान रख लिया न।कुछ छूटा तो नहीं देख लेना। मम्मी परेशान हो रही थीं ।
मुझे नौकरी मिल गयी थी ,आज ज्वाइन करने जा रहा हूँ। घर की फ़िजा फिर से बदल गयी है।
जीवन में बुरे वक़्त का आना भी जरुरी है।

Wednesday, April 27, 2016

नियति

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से नींद खुली।
पिछले दिनों घर और मन के शोर के कारण इनकी आवाज़ सुनाई ही नहीं दे रही थी।
आज घर में सन्नाटा पसरा हुआ है और मन भी शांत है।
तभी ख्याल आया मेरे आँगन की चिड़िया उड़ गयी और उदासी के बादल का टुकड़ा आ गया।
बेटी की विदाई के बाद घर के अंदर तो वीरानी छा ही जाती है बाहर से भी बेरौनक दिखने लगता है घर।
प्रशांत ने घर में घुसते ही कहा।
आ गए टहल कर।
बैठिए मैं नींबू पानी लाती हूँ
खुद को संयत करते हुए मैंने कहा और अपने आँसू छिपाते हुए रसोईघर की तरफ चल पड़ी।
                    पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद घर की सफाई अभियान में जुट गयी।4  दिन पहले ही बिटिया की शादी के लिए घर मेहमानों से भरा हुआ था।सबके जाने के बाद सब कुछ अस्त-व्यस्त हुआ पड़ा था। इसी क्रम में बेटी के कमरे में गयी।यहाँ आते ही यादों की किताब के पन्ने खुलने लगे ।कमरे की हर चीज से यादें जुडी हुई थीं । चलचित्र की तरह मानस पटल पर अंकित सभी घटनाएँ सजीव होने लगीं।घुटने के बल चलती हुई छोटी सी नियति,डगमगाते कदमों से चलने की कोशिश करती हुई,छोटी छोटी चुटिया बना कर गले में वाटर बोटल और कंधे पर बैग टांगे स्कूल जाती हुई,स्पोर्ट्स डे में दौड़ती हुई,मेडल पहनती हुई,कॉलेज के कॉन्वोकेशन में सर्टिफिकेट लेती हुई नियति।साइकिल चलाना सीखने में डरने वाली कब धड़ल्ले से स्कूटी चलाने लगी पता ही नहीं चला।एक एक पल मानो पलक झपकते ही बीत गए
दिन महीने में और महीने साल में बदलते जाते हैं,वक्त रेत की तरह हाथ से सरकता चला जाता है।
ऐसा लगता है जैसे कल ही की तो बात है जब मैं नियति को घर ले कर आई थी।
शादी के 10 वर्ष बाद मेरी गोद खाली थी।विवाह के 2 वर्ष बाद ही चिंता व्यापने लगी थी ,उसके बाद सैकड़ों तरह के ईलाज, दवा,डॉक्टरों और जानकारों से सलाह-मशविरा,जिसने जो कहा,जहाँ भी जाने की सलाह दी ,सब कुछ किया.......पर कोई नतीजा नहीं निकला।
जीवन बगिया हरी-भरी थी बस फूल नहीं खिल रहे थे।
      ऐसे में दोस्तों और रिश्तेदारों पहले तो दबे ढँके बाद में खुल कर यह कहना कि क्या करना धन जोड़ कर जब उसको कोई भोगनेवाला वारिस ही न हो ।
कभी कभी सास भी वारिस न होने का रोना रोती और अपने बेटे की दूसरी शादी की धमकी भी दे दिया करती थी। मैं अंदर ही अंदर टूटती जा रही थी।प्रशांत मेरे साथ थे सांत्वना देते रहते थे ।जीवन नैया ऐसे ही बिना  पतवार बिना मंज़िल के चली जा रही थी
संतानहीन होना औरत के लिए अभिशाप से कम नहीं होता है।समाज में मुँह चुराती हुई औरत जिस मानसिक यंत्रणा से गुजरती है उसके दर्द और वेदना को कोई महसूस नहीं कर सकता है।
एक दिन अख़बार में झाड़ी में फेंकी हुई नवजात बच्ची की ख़बर पढ़ी ।ईश्वर का ये कैसा न्याय है कोई एक बच्चे के लिए तरस रहा है और कोई कूड़ा-कर्कट की तरह फेंक रहा है ।और मैंने बच्चा गोद लेने का निश्चय किया ।
रात को जब प्रशांत आए तब उनके सामने मैंने यह प्रस्ताव रखा ।
अरे यार मेरे दिमाग में पहले यह बात क्यों नहीं आई।
उनकी इस प्रतिक्रिया से मैं हैरान भी हुई और खुश भी ।
अब समस्या थी ,माँ जी और पापा जी को मनाने की ।
गोद लेने की बात सुनते ही वो लोग भड़क उठे।
जिसकी न जात-बिरादरी का पता ,न खानदान का पता ,उसको अपने घर में रखोगे।
दिमाग ख़राब हो गया है तुमलोगों का और भी बहुत कुछ बोलने के बाद थोडा गुस्सा शांत हुआ तब प्रशांत के बहुत समझाने पर आखिरकार मान ही गए।
माँ जी -पापा जी की इच्छा बेटा की थी पर मेरी बेटी की क्योकि बेटियो के बिना घर सुना लगता है और एक दूसरा कारण था अनाथालय में पलने वाली लड़कियों का जीवन बहुत कठिन होता है,इसलिए कम से कम एक लड़की के जीवन में ख़ुशी ला दूँ तो अपने जीवन को सार्थक समझूँ।
हमदोनों को ही बेटी की चाह थी इसलिए
एडॉप्शन एजेंसी से सारी कार्यवाही करके एक बेटी ले आए जिसका नाम नियति रखा।
नियति ने मेरे जीवन को तपती धरती पर वर्षा की पहली फुहार के बाद उठने वाले सौंधी महक की तरह महका दिया था।
               शुरुआत में माँ जी और पापा जी को नियति को अपनाने में दिक्कत हुई पर बच्चे की निश्छल मोहिनी मुस्कान से कोई कब तक नज़रे चुरा सकता है।कुछ ही महीनों में सबकी लाडली बन गयी ।
मेरी गृहस्थी भी आप पूर्ण हो गयी लगने लगी थी।
जब नियति 5 वर्ष की थी तब स्कूल से रक्षा बंधन के त्योहार के बारे में जान कर आई और भाई की जिद पकड़ कर बैठ गयी।
एक ऐसी मुसीबत जिसका कोई समाधान ही नहीं। उसको अपने भाई को राखी बांधनी थी पर भाई कहाँ से लाएँ।
राजहठ,स्त्रीहठ और बाल हठ से पार पाना आसान नहीं होता है।
ऐसे में माँ जी का सूझबूझ काम आया ।बड़ी मुश्किल से समझा बुझा कर अपने लड्डू गोपाल की मूर्ति को नियति का भाई बना दिया और राखी बंधवाई।
ऐसे समय में लगता है घर में बुजुर्गों का होना कितना आवश्यक होता है।उनके अनुभव परेशानियों से कितनी आसानी से बाहर निकल लेते हैं।
इसे सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना का फल कहें या चमत्कार ,अगले रक्षा बंधन के एक महीने पहले लड्डू गोपाल खुद बाल गोपाल बन कर मेरी गोद में आ विराजे अपनी बहन से राखी बँधवाने
मेरा घर खुशियों से चहक उठा।सब बहुत खुश थे।नियति पहले सिर्फ लाड़ली थी दादा-दादी की अब तो सौभाग्यशालिनी भी हो गयी उनकी नजर में।
जिंदगी में खुशियों की बरसात हो रही थी तभी  वज्रपात हुआ ।देव,मेरा बेटा बीमार हो गया। बचपन से ही वो कमजोर था बार बार बीमार हो जाता था पर इस बार उसका बुखार उतर ही नहीं रहा था । महीने भर जब बुखार रह गया तब डॉक्टर ने बहुत सारे टेस्ट कराए।टेस्ट रिपोर्ट देख कर हम सबके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई ।उसकी किडनी ख़राब हो गयी थी ।डॉक्टर ने ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी । समस्या आई किडनी डोनर की,मैं और प्रशांत डायबिटीज,उच्च रक्तचाप और थायरॉयड से पीड़ित,इसलिए किडनी नहीं दे सकते थे। देवर किडनी देने के लिए तैयार थे पर देवरानी के दबाव में बाद में उन्होंने ने भी इंकार कर दिया। हम बेबस और लाचार थे बेटे की तकलीफ देखी नहीं जा रही थी ,कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें तभी नियति ने किडनी देने का फ़ैसला हमको सुनाया। मैंने और प्रशांत ने सुनते ही इंकार कर दिया, वो लड़की थी और उसकी सगाई भी हो चुकी थी ऐसे में उसका किडनी देने का निर्णय हमलोगों को उचित नहीं लगा।
माँ अगर मैं मेरे भाई के काम नहीं आऊँगी तो और कौन आएगा,प्लीज आप मत रोकिए।मैंने डॉक्टर से भी बात कर ली है और सारे टेस्ट भी करवा लिए हैं।उन्होंने कहा है कि मैं किडनी दे सकती हूँ। नियति ने मुझे समझाते हुए कहा।
बेटा तुम्हारे पापा डोनर ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं न ,मुझे भी भरोसा है कि जल्दी ही कोई मिल जाएगा। मैंने कहा
क्या जरुरत है डोनर ढूंढने की जब मैं दे सकती हूँ तब- नाराजगी से नियति ने बोला।
तुम समझ नहीं रही हो,तुम्हारी सगाई हो चुकी है तुम्हारे ससुराल वाले इसके लिए कभी नहीं मानेंगे और उनसे छुपा कर भी इस काम को नहीं किया जाएगा। तुम्हारी जिंदगी बरबाद हो जायेगी।
बेटे की तकलीफ क्या कम है जो बेटी का भी दुःख जीवन भर के लिए पाल लूँ- कहते कहते मेरी आँखें नम हो गयीं।
ओफ्फो माँ ! आप शालु आंटी और अभय अंकल को  जानती तो हैं फिर भी ऐसा सोच रही हैं ? आपको क्या लगता है,मैंने उनलोगों को इस बारे में नहीं बताया है ? इंफैक्ट श्रेयस और अंकल- आंटी से बात करने के बाद ही मैं डॉक्टर से मिलने गयी थी।यकीन करें आप उनलोगों को कोई एतराज नहीं है। ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह वो मुझे ये सब बता रही थी और मैं उसको देखे जा रही थी,ऐसा लग रहा था जैसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। आशातीत था सब कुछ पर नियति अपनी आशा के अनुरूप नहीं होती है यह भी सच है।
शालु मेरी सहेली है उसके परिवार के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है।नियति और श्रेयस की शादी की पहल भी उसने ही की थी और अब ये सब।यही सोच कर आँखों में ख़ुशी के आँसू छलक गए।दोहरी ख़ुशी थी बेटे को जीवनदान मिलने की आस जगी और बेटी को इतना अच्छा ससुराल मिल रहा है।
अपने जब साथ छोड़ते हैं पराए संभाल लेते हैं।देवर ने इंकार कर दिया दोस्त और परायी जाइ ने भँवर से निकाल लिया।
ऑपरेशन के बाद देव जब हॉस्पिटल से घर लौटा तब उसने नियति से बोला- दीदी तुम मुझे राखी बाँधती थी अपनी रक्षा करवाने के लिए पर उल्टा हो गया तुमने मेरी रक्षा की।
ऐसा नहीं है बुध्धू रक्षा का दायित्व सिर्फ एक पर नहीं होता है दोनों एक दूसरे की रक्षा करते हैं खासकर तब जब भाई छोटा हो। है न पापा नियति ने प्रशांत की तरफ हमेशा की तरह सहमति के लिए देखा जो उसकी हर बात पर सहमत ही रहते थे ।
दीदी आप यहाँ हैं और मैंने पुरे घर में आपको ढूंढ लिया। वृन्दा मेरी मेड ढूंढते हुए आई थी।उसकी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी। देखा तो बारह बज गए थे ।
कमरा उसी तरह अस्त-व्यस्त पड़ा था।पुरानी यादों में ऐसे गम हुई कि किसी बात का होश ही नहीं रहा।मन भी बड़ा विचित्र है पल भर में ही कहाँ से कहाँ पहुँचा देता है।
क्या हुआ दीदी बिटिया की याद आ रही है क्या ? वृन्दा ने पूछा।
हां रे उसके बिना घर भी सूना-सूना लग रहा है और मन भी ।कहने को तो सिर्फ एक कमरा खाली हुआ है पर देखो तो पूरा घर वीरान दिख रहा है। मैं अपने मन की बात वृन्दा से कर रही थी।
क्या करें ये तो जग की रीत है बेटियों को जाना ही पड़ता है।उसने भी ऐसे मौके पर दिए जाने वाले ज्ञान को दे दिया।
मैं फिर से सोचने लगी बेटियों का शादी के बाद माँ-बाप के घर से जाना तो नियम है पर जन्म लेते ही कूड़े के ढेर में,नलियों में जाना भी नियम है क्या
नियति के जन्मदाता माता-पिता ने भी उसकी विदाई की रही होगी उस समय उनकी मनोदशा न जाने कैसी रही होगी पर उसकी शादी के बाद वाली विदाई से जो संतुष्टि और बिछड़ने के दुःख में भी जो सुख मुझे मिला है उनको मिला होगा यक़ीनन नहीं।हो सकता है मन में कहीं एक पश्चयताप का भाव होगा उनके और होना भी चाहिए क्योंकि उन्होंने एक हीरे को पत्थर समझ कर फेंक दिया था जो मैंने पा लिया।

Saturday, April 16, 2016

रिश्ते: अपने पराए

दोपहर को ऑफिस में था तभी एक फोन आया जिसने मुझे बेचैन कर दिया । सारे काम छोड़कर सेक्रेटरी से कह कर टिकट्स बुक करवाया ।
घर फोन करके अरुणा को बताया निभा बुआ की तबियत ख़राब है जल्दी पैकिंग करके एयरपोर्ट पहुँचने का कह कर ऑफिस से निकल गया।
मन में बुरे बुरे ख्याल आ रहे थे किसी तरह उनको झटक कर खुद को संभाल रहा था। जब भी कोई मुश्किल समय आता है न जाने क्यों मन में नकारात्मक विचार ही आते हैं।
रास्ते भर अंतर्द्वन्द से लड़ते हुए घर पहुँचा ।
बुआ अंतिम साँसे गिन रही थीं।हमलोगों को देख कर उनके चेहरे पर ख़ुशी और संतोष के मिले-जुले भाव आए और एक हिचकी के साथ उन्होंने सँसार से विदा ले लिया। लोगों ने कहा उनके प्राण मेरे लिए ही अटके हुए थे।
इतनी जल्दी बुआ का साया हमारे सर से उठ जायेगा कल्पनातीत था मेरे लिए।
3 महीने बाद 60 की होने वाली थीं उस अवसर को यादगार बनाने की प्लानिंग कर रहे थे हमलोग ।अरुणा ने तैयारी भी शुरू कर दी थी लेकिन ऊपर वाले को यह मंजूर नहीं था।
उनके मरने की खबर जंगल के आग की तरह फ़ैल गयी,लोग जमा होने लगे भीड़ बढ़ती जा रही थी। शवयात्रा में लगता था पूरा शहर उमड़ आया है।पुरे इलाके में मातम सा छा गया।
वर्षों घर और शहर से दूर रहने के कारण मुझे पता ही नहीं था बुआ कितनी लोकप्रिय थीं।
वो एक ऐसी औरत थीं जो अपना कहे जाने वालों से तो दूर थीं पर पराए कहे जाने वालों की सगी थीं। जब अपनों ने नाता तोड़ लिया तो उन्होंने परायों से रिश्ता जोड़ लिया।
उनकी तेरहवीं तक मुझे यहीं रुकना था,इसलिए बच्चों को भी बुलवा लिया।।अब यहाँ का सारा भार मुझ पर ही था। मेरा शहर है यह फिर भी मेरे लिए अनजान है।पढाई और कैरियर में अपने शहर से कितना दूर चले जाते हैं हमलोग।
चाय पी लो की आवाज़ ने विचारों के भँवर से बाहर निकाला ।
अरुणा चाय ले कर आई थी।
किस सोच में डूबे हुए हो ? उसने पूछा।
बुआ के बारे में सोच रहा हूँ, मैंने चाय का कप उठाते हुए कहा।
सब कुछ इतना अप्रत्याशित हुआ कि मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ।
परेशान मत हो,जिंदगी में ऐसे क्षण आते ही हैं ।सबकुछ अपनी योजना के अनुसार कहाँ होता है। कह कर चली गई और मैं फिर से यादों के भँवर में गोते लगाने लगा।
बुआ एक योग्य डॉक्टर थीं, दूर दूर से लोग उनके पास इलाज़ के लिए आते थे।योग्यता को मधुर व्यवहार का साथ मिला और जादू हो जाता था। नर्सिंग होम में आने वाले लगभग सारे मरीज से उनके पारिवारिक रिश्ते बन जाते थे। नर्सिंग होम का सपना मेरे पापा ने देखा था,अपने छोटे से शहर बड़े हॉस्पिटल जैसी सुविधाओं वाला । दोनों ने मिल कर इसकी शुरुआत की थी बाद में बुआ ने उसमें रंग भरें ,पंख दिए और ऐसी ऊँची उड़ान भरी जिसे कोई और छू भी नहीं सका।

एक धन सम्पन्न परिवार की तीसरी संतान थीं बुआ,दो भाइयों की इकलौती बहन।बचपन लाड-प्यार में बीता लेकिन माँ का साया भी बचपन में ही छिन गया, चुलबुली ,हँसमुख और नटखट होने के कारण वो सबके आकर्षण का केंद्र रहती थी,अपनी बात किसी से भी मनवा लेने की कला जन्मजात थी।इन्ही गुणों के कारण स्कूल कॉलेज में भी लोकप्रिय थी और ताउम्र रहीं।
मेरे पापा से उनकी पहली मुलाकात कॉलेज के वाद-विवाद प्रतियोगिता में हुई थी,जहाँ इस अटूट रिश्ते का जन्म हुआ ।पापा की कोई सहोदर बहन नहीं थी बुआ ने इस कमी को पूरा किया।कभी कभी मन के रिश्ते खून के रिश्तों से ज्यादा मजबूत साबित हो जाते है अगर उसका आधार प्रेम हो न कि स्वार्थ।
दादाजी और दादी ने भी बुआ को अपनी बेटी मान लिया अब उनके दो घर थे।अपने घर से ज्यादा समय मेरे घर में बीतता था क्योंकि अपने घर में भाइयों की टोका टाकी और धौंस सहनी पड़ती थी उसके विपरीत मेरे घर में उनकी ज़िद और मनमानी को भी सर आँखों पर रखा जाता था।
पापा की शादी में भी बुआ की पूरी दखलंदाजी थी ,लड़की पसंद करने से रिसेप्शन तक की तैयारी उन्होंने ही की। जिंदगी सामान्य से चल रही थी तभी एक मोड़ आया और पिता का साया भी उनके सर से उठ गया ।यहीं से शुरू हुआ मानसिक यंत्रणा का दौर ।
पिता ने अपनी सम्पति तीनों संतान में बराबर बराबर बाँट कर वसीयत कर दी थी,भाई-भाभियों को यह बात नागवार गुजरी।
निभा डॉक्टर निभा थी पर थी तो लड़की ही उसको बराबरी का दर्जा क्यों
साम,दाम,दंड भेद जैसे भी हो वैसे सम्पति हथियाने की होड़ लग गयी दोनों भाइयों में।इससे क्षुब्ध हो कर उन्होंने अपना हिस्सा भाइयों के नाम किया और हमारे घर आ गयी।
दादी दादाजी की बेटी तो वो थीं ही सहर्ष उनको अपना लिया गया।दादा जी ने उनकी शादी कर देनी चाही पर बुआ ने इंकार कर दिया और उनकी ज़िद के आगे सबको झुकना पड़ा
जिंदगी के नए सफ़र की शुरुआत करने चल पड़ी ,पापा और बुआ ने साथ मिल कर पहले क्लीनिक शुरू किया ।धीरे -धीरे प्रैक्टिस भी जमने लगा और लोकप्रियता बढ़ने लगी।
बहुत छोटी उम्र में दुनिया के बहुत रंग उन्होंने देख लिए।घर छूट,सगे पराए हो गए।अपनों से दुःख मिला तो उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धान्त आत्मसात् कर लिया फिर तो न जाने कितने लोगों की बहन,बुआ मौसी बेटी बन गयीं पता ही न चला,इनलोगों से उनका रक्त संबंध नहीं था पर उनकी एक पुकार पर आधी रात को भी आ जाते थे ।इनलोगों के साथ दिल का रिश्ता था ।
मैं दसवीं में था तब हॉस्पिटल के लिए जमीन देख कर लौटते समय एक दुर्घटना में मम्मी पापा की मौत हो गयी।
तब से बुआ ही मेरी सब कुछ थीं ।मेरी छोटी छोटी जरूरतों का भी उनको ख्याल रहता था ,मम्मी-पापा की कमी कभी महसूस ही नहीं होने दी। पढाई-लिखाई ,शादी सब उन्होंने ही किया।मुझे डॉक्टर बनाना चाहती थी पर मैंने इंकार कर दिया मुझे एलएलबी करना था ।मेरा एडमिशन बैंगलोर नेशनल स्कूल ऑफ़ लॉ में करवाया ।अकेले ही घर और हॉस्पिटल की देखभाल करती रही पर मेरी शादी डॉक्टर से करवा दी
मेरी जिंदगी के हर पल में उनकी यादें बसी हुई हैं,उनके बिना जिंदगी कैसी होगी कल्पना भी नहीं कर सकता ।बहुत दूर चली गयीं
बार-बार प्रश्न मन में उठ रहा है बुआ मेरी अपनी थी या उनके भाई उनके अपने थे जो उनके मरने पर भी शोक जताने भी नहीं आए
कैसे ये रिश्ते हैं जहाँ पराए अपने हो जाते हैं और अपने पराए

Friday, December 26, 2014

भय और प्रेम

इस संसार में जितने भी जीव हैं सबको भय की अनुभूति होती है। बच्चा हो या वृद्ध ,मनुष्य हो या पशु सबको भय का अनुभव होता है।
  भय होने का कारण मन की कमजोरी,अज्ञानता,कायरता या लोकलाज को समझा जाता है परन्तु जब गहराई से इस पर विचार करेंगे तब पाएंगे कि भय का मूल कारण प्रेम का आभाव है।
वैसे तो एक कहावत प्रचलित है-"भय बिन प्रेम न होय"
पर वास्तविकता तो यही है की ऐसा प्रेम एक प्रकार की स्वार्थ की भावना है न की प्रेम ,भले ही वह स्वार्थ किसी भी प्रकार का हो,किसी भी कारन से हो।
स्वाभाविक प्रेम तो बिना शर्त होता है,कुछ पाने के लिए नहीं कुछ देने के लिए होता है। पाने के लिए किया गया प्रेम लोभ है,वासना है और व्यापार है।
वास्तविक प्रेम भयरहित होता है इसलिए जिससे प्रेम होता है उससे भय हो ही नहीं सकता है। भय के बल पर प्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता सिर्फ घृणा ही प्राप्त की जा सकती है।
जो जिससे भयभीत होता है वह उससे कभी प्रेम नहीं कर सकता और जिससे प्रेम करता है उससे कभी भयभीत नहीं हो सकता।
हम परमात्मा से प्रेम नहीं करते हैं इसलिए भयभीत रहते हैं। जो परमात्मा से प्रेम करता है वही अभय हो सकता है और उसे फिर कभी भी,कहीं भी तथा किसी भी स्थिति में भय नहीं लगता क्योंकि परमात्मा सर्वकालिक है सर्व व्यापक है यानि हर समय हर जगह मौजूद रहता है।